बुधवार, 29 अप्रैल 2009

ईमानदारी की खोज-ख़बर



एक दिन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ शंकर दयाल शर्मा जी के साथ किसी मुद्दे पर बातचीत हो रही थी। उस समय मैं उनका निजी सचिव था। उस समय उन्होंने मुझे एक रोचक, साथ ही बहुत जोरदार बात बताई थी। उसे मैं आज आप सबके साथ शेयर कर रहा हूं। 
उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री बनाया जाना था। तब पंडित जवाहर लाल नेहरु देश के प्रधानमंत्री थे। पंडित नेहरु ने डॉ॰ शंकर दयाल शर्मा जी से पूछा कि ” किसे उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना ठीक रहेगा।” डॉ॰. शर्मा ने मोहम्मद रफी किदवई जी का नाम सुझाया। इस पर पंडित नेहरु ने जानना चाहा कि किदवई साहब क्यों? डॉ॰ शर्मा ने कहा कि ”किदवई साहब एक ईमानदार नेता हैं।” यह सुनते ही पंडित नेहरु उत्तेजित हो गये। वे बोले ”शंकर, तो क्या तुम ईमानदारी को एक बड़ा गुण मानते हो। इसमें ऐसी बड़ी बात क्या है? यह तो होनी ही चाहिए।”डॉ॰ शर्मा कुछ नहीं बोल सके और पंडित नेहरु ने उनके द्वारा सुझाये गये नाम को रिजेक्ट कर दिया।
अब आप, यानी कि मेरे प्रिय पाठक, बताइये कि क्या सचमुच में ईमानदार होना कोई महान गुण है? मुझे लगता है कि पंडित नेहरु बिल्कुल सही थे। जैसे आग का गुणधर्म होता है-जलाना और हवा का गुणधर्म होता है-बहना, ठीक वैसे ही व्यक्ति का गुणधर्म होता है-ईमानदार होना। लेकिन यह सरल-सहज गुण इसलिए एक विशेष गुण बन गया है, क्योंकि अब ऐसे लोग मिलने मुष्किल हो गये हैं। अन्यथा तो यह एक सामान्य सी ही बात है। क्या ऐसा नहीं है? 
दूसरे यह कि जब हम ’ईमानदारी’ की बात करते हैं, तो ईमानदारी का अर्थ क्या होता है? चोरी न करना ईमानदारी है। लेकिन क्या चोर के द्वारा सावधानीपूर्वक चोरी करना, अच्छी तरह से सोच-समझकर चोरी करना उसकी ईमानदारी नहीं है? यदि अपने कार्य को लगन एवं निष्ठापूर्वक करना ईमानदारी का एक लक्षण है तो फिर हमें चोर की ईमानदारी को अलग तरह से परिभाषित करना पड़ेगा। 
मैं यहां इस लेख के द्वारा आपसे ईमानदारी पर आपकें विचार आमंत्रित करता हूं कि क्या होती है ईमानदारी। और इस बात की शरूआत मैं अपनी इस  परिभाषा से करता हूं कि ”जिनसे चेतना की परिभाषा दूषित हो, उन कार्यों और विचारों से दूर रहना ही ईमानदारी है।”
मुझे आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।

डॉ॰ विजय अग्रवाल

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर आलेख।

    बातें हों ईमान की काल पात्र अनुसार।
    भीतर की आवाज पर हरदम करें विचार।।

    लेकिन संस्कृत की एक उक्ति भी याद आ गयी-

    यद्यपि शुद्धं, लोक विरुद्धं, ना चरणीयम्, ना चरणीयम्।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. bahot khoob...kahin suna tha ki bhale hi kaam baeemani ka ho use bhi poori imandari se karna chahiye...Aise mahaul me imandari ki paribhasha khojna...meri shubhkaamnayen aapke saath hain.

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  3. आजकल ईमानदार होना वाकई एक गुण है, बड़ा गुण. भविष्य में तो यह एंटीक गुण हो जाएगा ऐसा लगता है.

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  4. चूंकि चेतना एक आधय्तामिक्क पारिभाषिक शब्द है जिसकी तीन स्तिथियाँ है चे़तन,अवचतेन व अर्धचतेन
    तीनो की पारिभाषा उनमे स्वमेय निहित है
    मेरे विचार से ईमानदारी को इस प्रकार परिभाषित कर सकते है
    "जिन कार्यों और विचारों से चेतना दूषित होती है, उनसे दूर रहना ही ईमानदारी है।”

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  5. परिभाषा तो नही जानता , पर मेरे लिए इमानदारी का तात्पर्य दैनिक कार्यो से हैं मसलन सुबह जल्दी उठकर मैं स्यंम को इमानदार महसूस करता हूँ । मेरी माँ मेरी वज़ह से तकलीफ़ में रहे ,और घर से बाहर मुझे लोग किसी भी कारण से इमानदार कहे ,फ़िर भी मुझे अपराध बोध ना हो ,तो मैं इमानदारी तो बहुत दूर की बात हैं ,पाखंडी भी कहलाऊंगा । मैंने मेरे दोस्त से झूठ बोला ,पर उस झूठ से उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए संवर गयी ,तो मैं स्यंम को इमानदार मान सकता हूँ । मेरे लिए इमानदारी एक गतिमान बोध हैं ,जिससे जीवन मानवीय बना रहे ,अनावश्यक अपराध बोध से मैं बचा रहूँ ,जीवन के प्रत्येक कर्म में ,काम के दरमियान व कम के पश्चात हम एक अहसास अर्जित करते हैं उस किए गए या किए जा रहे काम के बारे में ,यदि यह अहसास हमें और हमसे जुड़े तमाम लोगो को अंदर से रूहानी तौर पर खुश करे ,तब मेरा ख्याल हैं के हम ईमानदार हैं । जीवन के प्रत्येक पहलु को समभाव से देखना मेरी नज़र से इमानदारी का सर्वकालिक गुण हैं ।यथा कोई साइंस का अध्यापक ,पूर्वाग्रह से किसी आर्ट के स्टुडेंट को हत्तोसाहित करे ,तो वह ईमानदार नही हैं । जब हम इमानदार होते हैं ,साथ ही साथ हम जागरूक भी होते हैं ,याकी इसका उलट भी । हाँ होश मैं बेहोशी के कई काम होते हैं ,पर ऐसे लोग bबिन अल्कोहल के बेहोश होते हैं । नशे में कोन नही हैं ,हमें बताओं ज़रा ,किसी को दौलत का नशा .............................,,ऐसे बेहोश कभी इमानदार नही होते ।

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