शनिवार, 6 जून 2009

अजनबियों से भी अपनत्व से पेश आएं

मेरे लिए ऑटो से आने या जाने का मतलब होता था ऑटो वाले के साथ चिकचिक, बहसबाजी और झगड़े का होना। उस समय तो मेरी जान ही सूख गई, जब मुझे लगातार दस दिनों के लिए संसद मार्ग से एशियाड विलेज के लिए सुबह जाना था और रात में लौटना था। इसका मतलब था दिन की शुरुआत चिकचिक से होना और दिन की समाप्ति बहसबाजी में होना। यह बहुत दुखद था और असहनीय भी। मैंने मन ही मन ठाना कि इस बार मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। अब मैं ऑटो को रोकता और उससे ‘एशियाड विलेज’ चलने को कहकर उसमें बैठ जाता। बैठते ही मैं उससे पूछता कि ‘भइया कहां के रहने वाले हो?’ उसके उत्तर के साथ ही बातचीत का सिलसिला चल निकलता कि वह दिल्ली क्यों आया, उसके बच्चे कितने हैं और क्या करते हैं आदि-आदि। यह सिलसिला गंतव्य स्थल पहुंचने पर ही रुकता। ऐसा एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुआ। मेरी तरकीब ने जादुई तरीके से अपना काम किया था और मैं जीत गया था।
इससे मेरी यह धारणा पहले से भी अधिक मजबूत हो गई कि आज हर आदमी को अपनत्व की तलाश है। हाथ मिलाने वाले तो बहुत से हैं, लेकिन कंधे पर हौले से हाथ रखने वाला कोई नहीं है। पुचकार और दुलार की भाषा तो गाय और कुत्ते तक जानते हैं, फिर इंसान को भला कैसे खारिज किया जा सकता है, चाहे वह कितना ही अनपढ़ क्यों न हो।
किसी की पीठ पर रखे गए हाथ के स्पर्श का जादू हजारों उपदेशों तथा सैकड़ों आदेशों से ज्यादा कारगर होता है और इसके लिए हमें कुछ खर्च भी नहीं करना पड़ता। हमें केवल करना पड़ता है और वह भी थोड़ा सा। जो लोग जिंदगी में बहुत आगे निकल सके और जिन्होंने लोगों को अपने पीछे चलने को मजबूर किया, वे आदमी के अंतस को छूने के इस रहस्य को अच्छी तरह से जानते थे। इसे मैंने भी जान लिया है, आप भी जानने की कोशिश करें।

नोट - यह लेख बुधवार, 26 मार्च, 2008 को दैनिक भास्कर के 'विकास मंत्र' स्तम्भ में प्रकाशित हुआ था.

1 टिप्पणी:

  1. विजय जी के बारे में जानकर ख़ुशी हुई , आप जैसे लोग ब्लॉग्गिंग में आ रहे हैं , तो ज़रूर कुछ अच्छा ही होगा
    अखबार के बाद अब ब्लॉग पर पढने को मिल रहा है bahut achha hai
    सधन्यवाद,
    मयूर
    अपनी अपनी डगर

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